Wednesday, July 21, 2010

आज जनसत्ता में आलेख पढ़ा.आलेख जिस विषय पर था वो अलग बात है.उसकी १पंक्ति ने मुझे उद्वैलित कर दिया.वक्तव्य लेखक का नहीं किसी नेता(भारत भाग्य विधाता,जय हो)का है कि'अपनी पसंद का साथ केवल वेश्याएं चुनती है.'धन्य हैं हमारे समाज के सारथी और धन्य हैं उनके उदगार .
वक्तव्य अपने आप में इतना हास्यास्पद है कि आप उनके पिछड़े विचारों पर गुस्सा होने किजगह उनकी अज्ञानता पर हंसा जा सकता हाई बाद को चाहे स्त्री कि दारुण दशा पे रो लें.
महोदय,क्या आप मेरा ज्ञानवर्धन करेंगे कि विश्व के किस काल-खंड में स्त्री(चाहे वह देह्जीवा रही हो,नगर वधु से लेके हाई सोसाइटी escorts हो,)इतनी मुक्त रही है कि अपनी देह का ग्राहक अपनी मर्जी से चुन सके?पुरुष सदैव ही उसका स्वामी रहा है कि फिर चाहे भुजबल से तो कभी धनबल से उस का उपभोग कर सके.अंतिम बात मेरी नहीं, घुघूति बासूती की-"कभी आपने 'हसबेंड' और 'एनीमल हसबेंड्री' शब्दों के आपस में सम्बन्ध के बारे में सोचा है "

2 comments:

  1. अच्‍छा चिंतन, बधाई।

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