Tuesday, March 17, 2015
इला न देणी आपणी
मैं एकटक उसे देखे
जा रही हूँ, अपलक. राम के पूर्वज निमि अगर इस कलियुग में भी पलकों पर ही रहते
हैं तो वो निश्चिन्त ही इस समय स्वयं की पलकें झपकाना भी भूल गए होंगे. सच कह रही
हूँ कि मैंने इस के पहले ऐसा सम्पूर्ण सौन्दर्य शायद ही कहीं देखा हो, दर्पण में भी नहीं. झुक
कर सब्जी का डोंगा उठाती उस प्रोढा स्त्री का सौन्दर्य विधाता के खुले हाथों
लुटाये रंग-रूप में ही नहीं है उसके व्यक्तित्व में ही गुंथा हुआ है. उसकी पतली
कलाइयों की लोच में, अकृत्रिम पद-लाघव में, उसकी कमर में खुंसी सस्ती सी सिंथेटिक साड़ी
के तोतई हरे पल्लू में, उसकी सुघड़ नाक में पहने बड़े से बुलाक में, जो कदाचित उस का
एकमात्र शेष बच रहा आभूषण है, और उसकी अंतर्मुखी सी शालीनता में जो मैं लगातार कल
से नोट कर रही हूँ. वो अंतर्मुखता जो न सायास है न ओढ़ी हुई, न उसमे दैन्य है न
उदासी. स्वयं के लिए आत्मदया और दुनिया के लिए उपेक्षा तो कतई नहीं, वो एक लय में
डूबी है जो रोबोटिक भी नहीं और लौकिक भी नहीं. क्या है इस गरीब, अजनबी, अधेड़,
कामगर स्त्री में, मैं समझ भी नही पा रही हूँ और मुक्त भी नहीं हो पा रही हूँ. माँ
के जाने के दुःख और उनके गंगभोज की व्यस्तता के बीच भी वो मुझे लगातार अपील कर रही
है, या कह लूँ कि हांट कर रही है. उसे मैंने एक बार भी मुस्कराते नहीं देखा पर वो
कहीं से भी दुखी नहीं लग रही. हे भगवान, मैं तो इसका विश्लेषण करने बैठ गई, ‘हर
जगह कहानीकार बने रह कर चरित्र खोजते रहना ठीक बात नहीं हाँ मालती,’ मैंने खुद को टोका
और विदा में दिए जाने वाले भगोनों और मेहमानों का मीज़ान बिठाने लगी, अभी तो कुछ
साड़ियाँ भी और मंगवानी होगी और चार-छः भगोने भी.
“भाभी” मैंने भाभी
को आवाज़ दी.
“हओ बाई, बोलो.” पीछे भाभी की जगह कोई नई आवाज़ आ खड़ी हुई थी, मेरे लिए
अपरिचित. मुड के देखा तो वही किताबी चेहरा जिससे पीछा छुड़ा के मैं यहाँ भंडार में
घुसी थी. “नहीं, मैं भाभी को...”
“आई बाई सा, वो नसियां वाली काकी सा को छोड़ने गई थी. तू जा सुरसती,
बाई सा तुझे नहीं, मुझे बुला रही थी. दरअसल इसे यहाँ सब भाभी ही कहते हैं न तो... कितने
भगोने और साड़ी कम पड़ रही है?” मेरी भाभी एक बात में बहुत कुछ निपटा रही है. सुरसती
के जाने के बाद हमें बहुत कुछ करना था सो उस समय मैं सब कुछ भूल-भाल गई पर मैंने
दिमाग की टू डू लिस्ट में डाल लिया कि जोधपुर लौटने के पहले एक बार सुरसती से बात
जरूर करनी है, अगर ये राजी हो गई तो.
गंगभोज की व्यस्तता ओर मेहमानों की गहमागहमी के डेढ़ दिन जब गुजर गए और
बच रहे आधा दिन के लिए हम लोग कुछ फ्री हुए तो वो फिर मुझे हांट करने लगी.
“सुनो भाभी” मैंने उसे पुकारा पर मेरी आवाज़ पे उसने जरा भी तवज्जो नही
दी और अपनी आत्मलीनता में डूबी धुले बर्तन पोंछती रही, अब जब उसे मालूम है कि मैं उसे
भाभी नहीं बुलाती तो बेकार देखने का भी क्या फायदा. “सुनो ना सुरसती भाभी, मैं
तुम्हे ही बुला रही हूँ.” अब मैंने नाम लेके पुकारा और मैं अचंभित रह गई ये देख के
कि सुरसती इस सहजता से पास आ खड़ी हुई जैसे वो सदियों से मेरे पुकारे जाने के
इंतज़ार में ही खड़ी थी. उसके चेहरे पर सहज चुप्पी के अलावा कुछ नहीं है, न झिझक, न
उत्सुकता, न प्रश्न, न उतावली. बस पृथ्वी सी सहजता. “बैठो भाभी” मैंने कहा तो उसके
मुख पर एक अनिच्छा सी उग आई जो उसने छुपाई भी नहीं, “बोलो बाई, क्या चाहिए, पानी
लाऊं या चाय बना दूँ.” उसने गीले हाथों को सिन्दूरी साड़ी के किनारे से पोंछ लिया.
“नहीं, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस तुमसे बात करने को जी कर रहा है.” उसके सादा और
स्ट्रेट फारवर्ड मिजाज़ पर न मेरी कोई चतुराई चलती न ही मैंने कोशिश की, बस सीधे से
अपनी बात रख दी. “तो कर लो, पर क्या बात करोगी? मैं तो तुम्हें जानती भी नहीं, और
ना तुम मुझे” सुरसती शार्प है. “अरे, तो मुझे कौन सा रिश्तेदारी निकालनी है भाभी.
बस ऐसे ही तुम अच्छी लगी तो बात करने का मन हो गया, बैठो.”
मेरे नज़दीक चौकी पर बैठी सुरसती को मैंने जरा गौर से देखा, क्या रंग-रूप दिया है विधाता ने इसे... तिलोत्तमा... अपरूपा.. भुवनमोहिनी जैसे शब्द इसी रूप को मिले होंगे ना. “इसी रूप ने आज मुझे तुम्हारे आगे बिठा रखा है बाई.” सुरसती में बुद्धिमानी और स्त्रियोचित अंतर्दृष्टि दोनों है, नज़रों से भाँप लेना उसे शायद इस फुर्तीली देह के साथ ही मिला है तभी तो इस धर्मशाला की सबसे महंगी कर्मचारी है. ”मैं समझी नहीं भाभी, रूप के पुण्य से यहाँ हो या पाप से?”
“अब ये तो मालिक ही बताएगा आगे-आगे, मैं तो बस भोग रही हूँ.”
मेरे नज़दीक चौकी पर बैठी सुरसती को मैंने जरा गौर से देखा, क्या रंग-रूप दिया है विधाता ने इसे... तिलोत्तमा... अपरूपा.. भुवनमोहिनी जैसे शब्द इसी रूप को मिले होंगे ना. “इसी रूप ने आज मुझे तुम्हारे आगे बिठा रखा है बाई.” सुरसती में बुद्धिमानी और स्त्रियोचित अंतर्दृष्टि दोनों है, नज़रों से भाँप लेना उसे शायद इस फुर्तीली देह के साथ ही मिला है तभी तो इस धर्मशाला की सबसे महंगी कर्मचारी है. ”मैं समझी नहीं भाभी, रूप के पुण्य से यहाँ हो या पाप से?”
“अब ये तो मालिक ही बताएगा आगे-आगे, मैं तो बस भोग रही हूँ.”
“कहाँ की हो भाभी..”
सुरसती ने कुछ क्षण तोलती हुई, चतुर नज़रों से मुझे देखा, पास के हाल
में सामान सहेजती भाभी को देखा, अपने आसपास के सूने चौक को देखा और हर तरह से
आश्वस्त होके जवाब दिया “थी तो होशंगाबाद जिले की, पर अब जहाँ ये पेट ले जाये वहीं
की हो जाती हूँ बाई. अब तो ये पेट ही मेरा ठिकाना है और हाथ-पैर मेरे संगी साथी.”
सुरसती ने अपनी ओर आते लंगड़े चींटे को तर्जनी के निशाने से बरामदे के नीचे हिट कर
दिया. “पढ़ी-लिखी हो?” “हाँ, बारह दर्जे तक स्कूल गई थी, फिर सब छूट-छाट गया.”
“ भाभी, तुम थोड़ी-बहुत पढ़ी हुई भी हो, रंगरूप से भी अच्छे घर की दिखती हो फिर यहाँ ये काम क्यों...”
“ कहा ना बाई, ये रंगरूप मुझे नचा रहा है और मैं इसे...”
“ भाभी, तुम थोड़ी-बहुत पढ़ी हुई भी हो, रंगरूप से भी अच्छे घर की दिखती हो फिर यहाँ ये काम क्यों...”
“ कहा ना बाई, ये रंगरूप मुझे नचा रहा है और मैं इसे...”
क्या...क्या कहा इसने आखिर में..ये रंगरूप को नचा रही है, कैसे... अगर
ये बात कोई रूपजीवा कहती तो बात थी पर इसके, एक रसोई-चौका करने वाली, अधेड़ औरत के
मुँह से ये बात, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा पर मैं चुप रही. कुछ तो है ही इसमें, ऐसे
ही तो नहीं हांट कर रही ये मुझे... इस स्त्री के सहज बर्ताव के पीछे भी क्या एक
रहस्यमय अतीत है. मुझे खुद की ‘सास-बहु सीरियल मार्का बुद्धि’ पर हंसी और चिढ
दोनों आई. ‘खुद से खुद ही बुनती-उधेड़ती रहोगी या इस से भी कुछ सुनोगी’ मैंने खुद
को चुपाया और सुरसती से मुखातिब हुई. “कितने साल की हो भाभी ?” “अबके नवम्बर छियालीस
की हो जाउंगी बाई, 28 नवम्बर लिखी थी स्कूल के कागज में.” अरे हां, ये तो पढ़ी-लिखी
भी है ना. मुझे याद आ गया. “स्कूल में क्या विषय पढ़ती थी भाभी तुम?” मैं बात करने
को बात कर रही हूँ कि कहीं से तो कोई सूत्र मिलेगा लेकिन जब भाभी ने कहा “अंग्रेजी
और भूगोल” तो मैं एक बार फिर चौंक गई. सच
में कहानियों का पात्र है ये स्त्री. “फिर आगे पढाई क्यों छोड़ दी, यहाँ कैसे आ गई,
घर में क्या और कोई नहीं जैसे कितने ही प्रश्न मेरे मन में थे, सच कहूँ तो पूछने
का मन भी था, लेकिन इस तिलोत्तमा सुन्दरी में कुछ तो ऐसा है कि मैं ज्यादा सीधे-सीधे
कुछ नहीं पूछ पा रही हूँ और कुछ ऊटपटांग भी पूछ ले रही हूँ, जैसे मैंने अचानक पूछ
लिया “भाभी, तुम्हारी शादी तुम्हारी पसंद से हुई थी?” “नहीं, अब होगी.” भाभी के
कोमल रूप पर सुर्खी दौड़ गई, कठोर सी सुर्खी… ये एक और ट्विस्ट है, समझना मुश्किल है
कि ये डायलॉग ख़ुशी में आया है या तंज में, इसकी अब तक शादी ही नहीं हुई है या
मनपसंद की नहीं हुई है?
“क्या ! शादी या मनपसन्द वाली शादी?” मैं बिना आगे-पीछे सोचे धडाक से
बोल गई और अपनी इस बदफैली पर भीतर से सहम भी गई पर घटनी तो घट चुकी थी और... और
भाभी अब भी सहज थी. उसकी नाक का फूल स्थिर था. “सादी तो हो गई बाई, अब तो मनपसन्द वाली
होनी है.” हे प्रभु, एक और सिक्सर. क्या स्त्री है यार, कैसी तो बेबाक और कैसी तो
बेलौस. ये तो डराती है, कहीं गलत नम्बर तो नहीं डायल हो गया मुझ से... कौन जाने
कोई आवारा किस्म की ही हो जो अपने बुरे लक्षणों के कारण घर से भाग आई हो. पर ऐसा
होता तो धर्मशाला मेनेजमेंट इसे नौकरी पर रखता, इसे भंडार की चाबी रखने का सम्मान देता?
चलो मान लिया मेनेजमेंट तो पुरुष वर्चस्व का है लेकिन इस कस्बेनुमा शहर की खाँटी पारम्परिक
औरतें भी भाभी की तारीफ़ करती हैं जो ऐसी-वैसी औरतों को देखते ही मुँह नोचने पर
उतारू हो जाती हैं.
“क्या सोचने लगीं
बाई?” सुरसती ने पहली बार अपनी ओर से बात बढाई
“तुम बहुत अलग हो सबसे, रूप में भी और बुद्धि में भी.” सुरसती मेरी
बात का जवाब दिये बगैर चुप बैठी है, “तुम्हारा पहले वाला पति कैसा था सुरसती भाभी?”
लंगड़ा चींटा फिर बरामदे में चढ़ आया है.
“था नहीं बाई, अब भी है.” बाप रे... मैं सनाका खा गई, ये बेवा या तलाकशुदा
नही, पति को छोड़ कर आई हुई औरत है. ’चालू’ मेरे मन में पहला रिएक्शन वही उभरा जो
मर्दवादी समाज में बुनी गई स्त्री का होना था. उसकी नाक का फूल थरथराया “मैं ऐसी
वैसी औरत नहीं बाई. होती तो इस पराये पराए देस में चौका-बासन नहीं करती होती.”
सुरसती की आवाज भी काँप रही है, ना जाने कौन सा जेस्चर मेरे रिएक्शन की चुगली कर
गया जिसने इस मजबूत औरत को रुला दिया. मैं बिना कुछ कहे मुजरिम सी बैठी जाजम पर
सरसराते लंगड़े चींटे को देखती रही. “अभी आप घर जाओ बाई, मैं रात को आउंगी. मुकुल भैया
का घर जानती हूँ मैं.” सुरसती ने एक टूक फैसला सुनाया, घिसटते लंगड़े चींटे को अपनी
चप्पल के आघात से देहमुक्त किया और भंडार में घुस गई.
रात 10 बजे के लगभग, जो मैंने
सोचा था ठीक उसी समय, सुरसती भाभी लान में आ खड़ी हुई और वहीँ बैठने का संकल्प लिए
एक कुर्सी पर जम गई. हालाँकि जाती हुई हुई ठंड है पर रात दस बजे लान में बैठना... खैर.
“अब पूछो बाई, का पूछने हैं तुमाए लाने. ऐसे तो हम कोनऊ को नईं बताते हैं
पर तुम इत्ती बड़ी मास्टर, लिखवे-पढवे वाली दीदी, चार दिन से हमाए चक्कर खा रही हो,
हमारे बारे में सोचत हो तो बताने आ गए. तुम हम पे साई एक कहानी लिखई देव बाई.” यहाँ
खुल के बुन्देलखंडी में बोलती सुरसती अपने स्वभाव के फुल फार्म में है, फोकस्ड, टू
द पॉइंट. मुझे भी इधर-उधर की बात करने का कोई औचित्य नहीं लगा. “कोई नई बात तो है
नहीं भाभी, तुम मुझे सबसे बहुत अलग लगी और मेरा तुमसे बात करने का मन किया. और बात
करने के बाद तुम मुझे और भी ज्यादा अलग लग रही हो, बताओ न कुछ अपने बारे में.”
“बताऊँगी, बतावे तो आये हैं, तुमाओ भरोसा भी है और जा तसल्ली भी के अगर
हम मर गए तो जो सच हमाए संग तो ने मरहें न. ऐसे काय देखत हो बाई, हमाई मौत तो हमाए
संगे चल रही है. और तुम डरत काय हो, इते अबे कछु ना हुइए.” सुरसती को राम ने कोई
भीतरी आंख तो जरूर दी है जो वो सामने वाले की एक-एक साँस को पढ़ लेती है, “तुम भीतर
जाओ लाला.” मेरा भतीजा पास आके बैठने लगा था कि सुरसती ने उसे बेहिचक बरज दिया.
“हम होशंगाबाद जिले के एक छोटे से गाँव के ठाकुर की मोडी आए. दाल-रोटी
खात भये गिरस्थ घर की मोडी. सब मोड़ियों के जैसे घर को काम करत, भईया-बहनों से लडत,
मताई से ठुकत-पिटत, स्कूल जाती मोड़ी. सब मोड़ियों में और हम में बस एक ही अंतर हतो कि
बिधना ने हमाए लाने ये रंगरूप दियो जो हमाए मताई-बाप के जी की आफत बन गयो. राम
कोनऊ को जे रूप ना दे बाई. एइके कारण आज हम दर-दर के हो रहे हैं.”
“क्यों भाभी,” शायद इसका अपहरण हुआ हो या बलात्कार के बाद घर से निकाल
दी गई हो, मेरे टेलीविजनी प्रीडिक्शन चालू है. शुक्र है सुरसती अपनी यादों में
आँखे फेरे हैं, वरना अभी एक तीर आता.
“माँ-बाप सारे माँ-बापों
जैसे थे, वो गरीब के धन की तरह हमें सम्भाल-सम्भाल के रखते, सारे बखत चौकसी की आँख
रखते, अकेले घर से जाने की छुट न घर पे फालतू आदमी आने की रजा. स्कूल भी जाती तो
बहन के साथ. उसकी छुट्टी हो तो मुझे भी घर रहना पड़ता. न खेत पे अकेली जा सकती थी
ना हाट-बाज़ार. मेले-ठेले, शादी ब्याह का मतलब ही नहीं. जहाँ अम्मा, जिज्जी जाये
वहीं जाओ बस. और तो और दिसा-मैदान भी अम्मा के बिना नहीं निकल सकते थे हम.” सुरसती
ने यादों की पोटली फैला ली है और खुद भी उसमें उलझ गई है, मैं साफ देख रही हूँ कि
अपने रूप का वर्णन करते समय वो जरा भी खुश नहीं बल्कि तिक्त ही हो रही है. “अम्मा
अकेले में लाड लड़ाती पर सबके सामने गालियाँ देने के मौके तलाशती. घर में वैसे भी
कोई घी-दूध की धार नहीं बहती थी पर जो भी था उसमे से भी मुझे कम से कम दिया जाता
कि मेरी देह पहले ही लम्बी-पूरी थी. जिज्जी दो बरस बड़ी हो के भी सूखी पापड़ी सी थी
सो वो भाई के साथ घी-दूध खाती, मुझे चिढाती और मैं कक्का के डर से चुप बैठी कुढती
रहती.” सुरसती फिर से हिंदी में बोलने लगी है, शायद समझ गई है कि मुझे बुन्देलखंडी
कम पल्ले पडती है.
“क्या तुम्हारी बहन सुन्दर नहीं थी?”
“थी. अम्मा-कक्का दोनों सरूप थे तो हम तीनों बच्चे ही बहुत अच्छे
रंग-रूप के थे पर मेरे साथ खड़ी होके तो वो भी उन्नीस पडती थी. वो ही क्या आसपास के
गाँव की हर लड़की मुझ से उन्नीसी ठहरती थी, इस कारण मैंने बहुत कुछ झेला सहा भी है
बाई, गाँव की लडकियां न मुझसे दोस्ती करती न मुझे अपनी टोली में साथ लेती. इसी
कारण मैंने स्कूल में भी बहुत नीचा देखा है.” प्रतिपदा की चांदनी सुरसती की नाक के
फूल को छूने के प्रयास में उसकी लम्बी कंटीली बरोंनियों में उलझ गई है और वहाँ से निकलने
की कशमकश में उसकी बरोनियों को थरथराने में लगी है. अकम्प बैठा उसका प्रोढ़
सौन्दर्य लॉन में आसक्ति और विरक्ति का मिलाजुला अजीब सा प्रभाव पैदा कर रहा है. अचानक
मुझे आज पहली बार ये अनुभव हुआ कि ऐसा रूप विरक्ति के बिना आसक्ति नहीं दे सकता और
किशोर उम्र की युवतियाँ इस से खौफ खाती थी तो क्या अनहोनी करती थी. किसी भी युवती
को कमतर दिखना नहीं अच्छा लगता. हवा में खुनकी बढ़ गई है सो सुरसती ने अपनी चटख गुलाबी
साडी का पल्लू गले में लपेट लिया है और बाउंड्री पर रखे पोधे को गौर से देख रही
है.
”ये हरसिंगार है ना बाई? हमारे गाँव में नर्मदा मैया की कृपा है, खूब
हरियाली और पेड़-पोधे पनपते हैं वहाँ. मुझे बहुत शौक था धरती और पोधों का और इसलिए
मैं ने भूगोल लिया था दसवीं के बाद, पर....” सुरसती के बाकी शब्द गले में अटक गये लेकिन
उनका अर्थ मुझ तक फिर भी पहुंच गया. तुम भी मेरे देश की उन करोड़ों लड़कियों जैसी हो
जिनकी पढने-लिखने की चाह समाज का भय लील जाता है. वो भय जो पिशाच की तरह माँ-बाप
के गले में हर समय झूलता रहता है, तब तक जब तक कि ब्याह के मंडप में खड़ा हो कर
लडकी के सपनों की बलि ना लेले. इस बेचारी के साथ भी यही हुआ होगा. सुरसती अब जमीन
पर लगे छुईमुई के पोधे को छेड़ने में लगी है. “बाई इसे उखाड़ के फैंक दो, ऐसे कमजोर
पोधे को घर में रखना ही क्यों जो छूते ही मुरझाए. पोधे मजबूत हो या फिर गुलाब जैसे
कंटीले.” और मुझे लंगड़े चींटे को मसलती चप्पल याद आ गई. “छोडो भाभी, तुम अपनी बात
बताओ ना.” मैं उसकी तरह टू द पॉइंट हूँ,
“हओ बाई. तो, ऐसे
करते ही हम दोनों बहने जवान हो गई. मैं दसवीं में और जिज्जी बारहवीं क्लास में थी
जब दीदी को लड़के वाले देखने आये. मुझे पहले ही दूसरे गाँव मौसी के घर पहुंचा दिया
गया कि कहीं लडके वाले मुझसे मिलने की
इच्छा ना जता दें और मेरे कारण दीदी के नसीब से इत्ता अच्छा घर-बर ना छूट
जाए. खैर, पास के गाँव के छोटे ठिकानेदार के बड़े बेटे ने हमारी जिज्जी को पसंद भी
कर लिया और उन दोनों का ब्याह भी हो गया. जिज्जी शादी के बाद घर लौटी तो देह सोने,
संदल और सिल्क से गमक-दमक रही थी और वो खूब खुश थी. जीजाजी हमसे भी बड़े खुश रहते,
कित्ती बार हमे घर भी बुलाया पर न हमे जाना पसंद था न अम्मा-कक्का को भेजना.
जीजाजी जब भी घर आते, हम दोनों भाई-बहनों के लिए कपड़ा-मिठाई लाते, हम से खूब बातें
करते. बड़ों का मान रखते, अम्मा-कक्का से आंख झुका के बात करते. साल भर में जिज्जी
के पांव भारी हो गये, हम सब खुश थे. मेरी पढाई भी अच्छी चल रही थी और कक्का जीजाजी
के साथ मिल कर मेरे लिए लड़का भी देख रहे थे.” पुराने दिनों में खोई सुरसती के कुछ
साल भी मानों पीछे लौट गये हैं. वो प्रोढ़ा से किशोरी में तब्दील हो गई है. अपने
अच्छे दिनों को जीती किशोरी. भाभी दो बार चक्कर काट गई, वो चाहती हैं कि हम कमरे
में नहीं तो कम से कम बरांडे में तो बैठ ही जाएँ पर सुरसती अंगद का पैर और मन
दोनों रखती है. “तुम चिंता नहीं करो दुलहिन,
को कुछ नहीं होगा, अब इत्ती ठंड नहीं है.” दरअसल सुरसती भाभी से पहले से ही
जरा खुली हुई है तभी तो बेहिचक घर आ जाती है, उसने भाभी को दुल्हिन कहने का अधिकार
भी ले रखा है. कोई जरूरत पड़ने पर वो भैया-भाभी के पास ही आती है. और उसकी जरूरतें
होती हैं मनी ट्रांसफर करवाना जैसे बैंक के छोटे-मोटे काम या कभी कोई दवा ला देना.
“और कक्का को मेरे दुल्हे के लिए ज्यादा खोज भी नहीं करनी पड़ी, जीजाजी की बुआ के
लडके से मेरी सगाई हो गई. और आते जेठ का ब्याह भी तय हो गया.”
“और लड़का तुम्हें
पसंद नहीं था,” मेरा उतावला स्वभाव अपने ही निष्कर्ष खोज रहा है, इसी ने तो बताया
था कि अभी मनपसन्द की शादी होनी बाकी है.
“उस उम्र में कोई लड़का जल्दी से बुरा नहीं लगता बाई, फिर ये तो
माँ-बाप का ढूंढा हुआ लड़का था. बिन बाप का बेटा, घर का गरीब था पर पढने में बहुत
तेज था, अच्छा रंगरूप, कॉलेज में बीएससी पढ़ रहा था, तो क्या बुरा लगना था, फिर भी मैं
खुश इसलिए नहीं थी क्यूंकि मेरी पढाई छूट रही थी.” सुरसती का ये वाक्य राजनैतिक सा
है, लड़का पसंद था या नहीं कुछ स्पष्ट नहीं हुआ. चांदनी भी उसकी पलकों से निकल के
नीम के पत्तों से आँखमिचोनी में लग गई है, सो साफ़ दीख भी नहीं रहा कि उसके मन में
क्या चल रहा होगा.
“मेरे शादी के
घोड़ी-बाजे, धर्मशाला सब तय हो गए थे, बुलावे का पहला कार्ड गणेश जी को भेज दिया
गया था और अम्मा ने मौत-उठावने में जाना बंद कर दिया था, लेकिन भेमाता को तो कुछ
और ही मंजूर था, जिस दिन आंगन में पड़ोसनों ने पहली बरनी गाई उसी रात जिज्जी को
जोरदार दर्द उठा, उसे घर पर ही छ्मासा बच्चा हुआ और अस्पताल ले जाने तक चटपट में
खेल ख़त्म हो गया.” ओह, वही फेमिली मेलोड्रामा. मुझे आगे की सारी कथा समझ आ गई. अब
जीजा से ब्याह और क्या.
“सही सोच रही तुम
बाई” सुरसती ने फिर मेरा मन पढ़ लिया. “मैं हल्दी लगी, पीढ़े चढ़ी, बान-तिलक सब हुआ
पर बियाही गई जीजाजी से. मानसिंग, मेरा मंगेतर, जीजाजी का दुःख देख के खुद ही पीछे
हट गया तो उसकी माँ ने भी कुछ नहीं कहा और मेरे माँ-बाप की तो औकात ही क्या थी.” सुरसती
का मुख और वाणी दोनों निर्विकार है.
“तुम्हारी मर्जी के
बिना...”
“हम तो जिज्जी के
शोक और अम्मा के दुख से पगला रहे थे, सो बिना कुछ सोचे सब करते गए.” बहुत सामान्य
सा चरित्र है ये औरत तो, मैं एवेंई इसे इतना फुटेज दे रही हूँ? मेरे मन ने पाला
बदलना शुरू कर दिया, कौन सी नई और अनोखी कहानी है इसकी, ऐसी गाथा तो लगभग हर दुखी
आत्मा के साथ संलग्न मिलती है.
“फिर तुम यहाँ कैसे...
?”
“बताते हैं बाई, जरा
धीरज धरो, आप बहुत उतावली हो, इत्ता उतावलापन ठीक नहीं” सुरसती पहली बार हंसी है
और मैं उसकी बात पर नाराज होने की जगह वाकहीन बनी उसकी हंसी देख रही हूँ, जैसे
कोरे घड़े से छलकती मदिरा, और उस पर उसकी हंसी से चमकती काली आँखे... जैसे कांच की
प्याली में धरा अफीम. कोई कैसे इससे अछूता रह सकता है. मेरा मन मर्दाना सा होने
लगा.
“सारे दुख-शोक के
बीच सादगी से हमारा ब्याह हुआ और ठाकुर सा ने मुझे राजरानी बना दिया. सातों सुख
मेरे आँचल में ला धरे थे उन्होंने. मैं खुश न होकर भी खुश रहती, अम्मा-कक्का भी
मेरे सुख में जिज्जी का दुख भूलने की कोशिश कर रहे थे. बियाह के लगभग चार बरस बाद
मुझे एक बच्ची हुई, ऐन मेरे जैसी, जैसे विधाता ने मेरा ही रूप दुबारा घड दिया हो.
ठाकुर सा ख़ुशी के मारे बावले से हो हो गये थे. राजराजेश्वरी कह के बुलाते थे वो
बिटिया को. जिस दिन मैंने कुवा पूजा उस दिन सारे गाँव को न्योता दिया लगा, खाने-पीने
दोनों का. ठाकुर सा भी जम के छके. नाच-गाने का भी खूब रंग जमा. जब रात आधी ढल गई,
आंगन में शांति हो गई तब ठाकुर सा मेरे पास आए, वो बहुत खुश थे. आते ही बच्ची को
गले से लगा के उससे खेलने,बातें करने लगे. नशे की झोंक में कभी हंसते, कभी रोते,
कभी उसे लड़ाते तो कभी मुझे दुलारते.
‘मेरी बेटी, मेरी राजराजेश्वरी,
मेरी लाड़ो, तू मेरे जीवन की जोत है, मेरी ख़ुशी है तू. सरो, मैंने आज पांच बीघा
जमीन खरीद ली है इसके नाम, और होशंगाबाद में एक प्लाट भी ले लिया. मैं इसे खूब
पढ़ाऊंगा-लिखाऊंगा, जीवन के सारे सुख दूंगा और बहुत बड़े ठाकुर घराने में
ब्याहुंगा,’ कहते हुए ठाकुर सा ने पंचलडी की मटरमाला जेब से निकाल के मेरे हाथों
में धर दी. बेटी की ख़ुशी और ठाकुर सा की बातों से मैं भी खुश थी और इसी भावुकता में
कोमल होकर मैं ठाकुर सा के गले लग गई, चार सालों में पहली बार. ‘मेरी सुरो, आखिर
मैंने तुझे पा ही लिया, कितने पापड़ बेले मैंने तुझे पाने को, हत्यारा भी बना, पाप
भी कमाया पर आज तुझे और लाडो को पाके मैं धन्य हो गया, अब इसकी और तेरी ख़ुशी में
ही मेरा स्वर्ग है, अब मर के नरक में भी जाऊं तो कोई गम नहीं होगा मुझे.’ ठाकुर
नशे और ख़ुशी में बक गया कि उसी ने जिज्जी को मारा था, मेरे इसी रूपरंग को पाने की
खातिर.” सुरसती की आवाज़ नर्क से आ रही है. नारकीय यादों की बदबू के भभके से सडती
और कालकूट सी जहरीली, जिसकी लपट मुझ तक आ रही है, मेरा आपा झुलसने लगा. मैंने देखा
सुरसती का सर्वांग कस के कठोर हो गया है. उसका गुलाबी आँचल उसके गले में पहले से
भी ज्यादा कसा हुआ लग रहा है. नीम के फूलों की कसैली गंध वातावरण में महक रही है
और पास के बंगले से किसी बच्चे का रोना और उसकी माँ का बहलाना समवेत स्वर में इधर
बह के आ रहा है.
“बालक की रुलाई में भी भगवान बसते हैं बाई.” सुरसती उन आवाज़ों पर
अभिभूत सी कह उठी. “मेरी बच्ची भी रो पड़ी थी उस छन में और बस, मुझे ईश्वर का इशारा
समझ आ गया.”
“मार दिया तुमने उसे?” मैंने सबसे नजदीकी कयास लगाया. और सुरसती मेरी
और देख के दुबारा हँस दी, एक नादान को देखती सयाने की हँसी.
“नहीं बाई, मैं उसे
मार देती तो अपना बदला कैसे चुकती, वो राक्षस तो आज भी जिन्दा है. आज इक्कीस साल
होते आए, पागलों की तरह डोलता रहता है, मुझे और अपनी बेटी को खोजता रहता है. वो
बेटी जो उसकी जान थी, उसके बिछोह में मारा-मारा फिरता है.”
“तुम उसे छोड़ आई थी?”
“और क्या करती, धोखे से जमीन पे कब्जा करने वाले को फसल नहीं मिलने
चाहिए ये मेरा मानना है और मैंने उसे नहीं ही लेने दी. उसने मेरी बहन छीनी, मैंने
उसकी ख़ुशी चुरा ली. सुबह मुँह अँधेरे ही अपनी बेटी को लेके घर से निकल गई तो मुड
के नहीं देखा. तब से अब तक कितने धक्के खाए, क्या-क्या सहा, पर लौट के नहीं गई.”
“सवा महीने की बच्ची
को लेके निकल गई, कैसे पाला होगा तुमने अकेले, वो भी नई जगह पर?” मैं अवाक रह गई. “जैसे
सब गरीब अकेलियों के बच्चे पलते हैं, मेरी बच्ची भी पल गई. और मैं भावुक जरूर थी
बाई, पर मूरख नहीं, मैंने बेटी को लेके घर छोड़ा था तो उसकी चिंता थी मुझे. मेरे
पास घर से लिया कुछ पैसा-टका था उस समय, और कुछ गहना-गांठा भी. शुरू के कुछ महीने
बैठ के खाया, बाद में ये रसोई का हुनर काम आ गया.” सुरसती के हाथ में अन्नपूर्णा
बसती है ये सब जानते हैं.
“और उसने तुम्हे
ढूँढा नहीं?”
“क्या लगता है तुमको
बाई, नहीं ढूंढा होगा. पर मैं तो कोसों दूर गोहाटी में जा छुपी थी, मिलती कैसे?
तीन साल मैं वहीं रही, कैसे रही या कैसे रहती हूँ ये ना पूछना, फिर वहाँ से
दार्जिलिंग चली गई, फिर काठगोदाम, फिर देहरादून. और इसी चक्कर में आज यहाँ, तुम्हारे
देस नोहर में बैठी हूँ.”
“अपने माँ-बाप से भी नहीं मिली तुम? और तुम्हारी बिटिया राजराजेश्वरी,
वो कहाँ है?”
“मेरे पास कोई राजराजेश्वरी नहीं रहती बाई. नर्मदा, मेरी बेटी, को मैंने
दार्जिलिंग के एक क्रिस्तान (मिशनरी) स्कूल में डाल दिया था. आज वो कलकत्ता में कम्पुटर
की पढाई कर रही है. वो खुद भी वहां टूशन पढ़ाती है और अपना खर्चा निकाल लेती है.
जरूरत हो तो मुकुल भैया से कह के हम पैसा भिजवा देती हैं. उसको मोबाइल दिला रखा
है, कभी-कभी मैं ही बात कर लेती हूँ, कभी मिल भी आती हूँ पर उसे कभी नही बुलाती. अम्मा-कक्का
तो अब रहे नहीं पर बेटी की कोसिस से ही पांचेक बरस से भाई-भाभी की खबर है मुझे. वो
राक्षस अब भी बेटी के लिए मारा-मारा फिरता है, रातों को रोता-चिल्लाता है, दारू के
नशे में सिर फोड़ता है, वोही लोग तो बताते हैं मुझे. और सच्ची कहती हूँ बाई, मेरे
कलेजे में हर बार एक नई ठंडक पहुंचती है. सुरसती के गाल चांदनी में भी दहक रहे हैं
और खिली चांदनी सी शफ्फाक आँखों की चमक में एक आंच सी कौंध रही है. “उसे भी मालूम
पड़ रहा है कि माँ-बाप से उसका बच्चा छीन लेना क्या होता है. उसने मेरे माँ-बाप के
बच्चों को छीना मैंने उस की बच्ची. उसने मेरे प्रेम को दरबदर किया, मैंने उस के इस
रूप को. मेरी ज़िन्दगी उजाड़ के वो भी राज़ी तो नहीं ही रहा.”
“तुम खतरनाक हो
भाभी.” मैंने मजाक किया. “लेकिन तुम तो दूसरी शादी भी करने वाली हो न, इस बार अपनी
पसंद की. कौन है वो?”
“मानसिंग, मेरा मंगेतर.” सुरसती ने एक और स्केम ओपन किया.
“लेकिन वो तो उसी समय हट गया था न, या वो तुम्हारे साथ ही... ?” ओह,
तो ये माज़रा है. मुझे कुछ-कुछ समझ आने लगा है.
“हाँ, हट गया था, कभी नहीं मिला मुझसे. मेरी
शादी के बाद ही घर छोड़ के कहीं निकल गया था, तब से किसी को खबर नहीं कि वो कहाँ
हैं.” सुरसती ने एक बार फिर मुझे झूठा सिद्ध कर दिया. “पर उस से क्या, कभी तो
मिलेगा, आज नहीं तो कल, इस दुनिया में नहीं तो भगवान के घर, मेरी आस में कोई कमी
नहीं, जाने वो कब मिल जाए ये सोच के ही मैं कभी फीका कपड़ा नहीं पहनती कि मिलते ही
उस से ब्याह कर लूँगी. जिसकी जमीन है उसे तो सौंपनी ही है ना बाई.” धरती, सच ये
स्त्री धरती सी सर्वरूप, दृढकोमलांगी और आत्मसंपन्न है, जो देना न चाहे तो कोई माई
का लाल इससे कुछ नहीं ले सकता चाहे मर ही क्यों न जाये. ”चलती हूँ बाई, जिन्दगी
रही तो जरूर मिलूंगी, सुरसती हाथ जोड़ के उठ गई. “पर कल से से मैं अकाल मौत मर जाऊं
तो मेरी कहानी जरूर लिखना. और हाँ, दुख भी नहीं मनाना. बेटी अब बड़ी हो गई है, उसे
मैंने खूब पढ़ा-लिखा के मजबूत बना ही दिया है तो क्या दुख-चिंता करनी हुई बाई. चलती
हूँ मुकुल भैया.” सुरसती ने बरामदे में खड़े मुकुल भैया को हाथ जोड़े, मेरी और
स्नेहसिक्त मुस्कान डाली और निकल गई. चांदनी के धुंधले उजाले में जाती हुई
सुरसतिया किसी शापित, निर्वासित देवदूत की आत्मा सी दीख रही है और पिता जी के कमरे
के रेडियो से बजते गीत की पंक्तियाँ मानों उसे सलामी दे रही है...’इला न देणी आपणी, हालरिया हुलराय, पूत सिखावे पालणै, मरण बड़ाई मांय...’**
**राजस्थानी कवि सूर्यमल्ल मिश्रण की प्रसिद्ध काव्य-पंक्तियाँ
जिसमें वीर प्रसूता माँ अपने पुत्र को पालने में झुलाती हुई सीख देती है कि अपनी
जमीन किसी को नहीं लेने देनी चाहिए, इस के लिए लड़ते हुए अगर मृत्यु भी मिले तो वह प्रशंसनीय
होगी.
पूस की एक और रात
पूस की एक और रात
“दौड़.....दौड़ बाबू....जोर लगा बाबू...जोर से
भाआआआआअग ..बाआआआबू....“ कानजी की साँस की धोंकनी के बीच उसकी आवाज़ खराश सी बजी और
चिर के टूट गयी. बाबू जान छोड़ के उसके पीछे
दौड़ रहा है...पूस की रात की सघन हवा और रात के एक बजे का सन्नाटा, दोनों के चार
पैर ही पूरी पलटन की कवायद सा शोर मचा रहे हैं. शांय-शांय करते अँधेरे में उनकी
साँसे साइरन की सी बज रही है....”भाग बाबू ....इस गली से जल्दी बाहर निकल, इधर से
नहीं बावले... इधर से मुड़, जल्दी कर, परली तरफ बड़ी सडक है और
वहाँ निरे संतरी घूमते रहते हैं. पकडे गये तो मारे जायेंगे.“ कानजी बाबू का हाथ पकड़
कर बाईं गली में धंस गया. गली सूनी और अँधेरी है. ट्यूबलाईट भी इक्का-दूक्का ही जल
रहीं हैं. थोड़ी राहत देख के बाबू के पाँव हलके पड़े तो कानजी ने भी पैर धीमे कर
लिए.
“भैया, थोड़ी देर ठहर जा ना, इधर तो कोई संतरी भी
नहीं है.” बाबू को अभी इस सब की हटूटी नहीं है, पक्की सड़कों पर दौड़ते उसके पग
रपट-रपट जाते हैं. कई दफा तो वो गिरने को हो गया, एक दफे तो पड़ ही गया, शायद अंगूठे
से अब भी खून बह रहा हो. अभी बालक ही ही
तो है बाबू, ये लम्बी-चौड़ी देह जरूर बीस साल की सी है पर वो अभी पूरा पंद्रह का भी
नहीं हुआ है. और शहर में तो आज पहली ही रात है उसकी. बाबू की आवाज़ में थकान ही
नहीं आँसू भी है, अँधेरा था सो कानजी ने देखा तो नहीं पर भान किया कि बाबू की हालत
पतली है, उसके पाँव आप ही धीमे पड़ गए. “सुन, इस गली से परली तरफ निकल लें, बस उधर
मसान है वहाँ रुक जायेंगे. इधर चौकीदार आ गया या जाग हो गई तो मरण हो जायगा.“ भाग
ले मेरे शेर, जवान मोट्यार है यार, थोडा और जोर मार ले.” कानजी ने बाबू का हौसला
बढाया. ”और शहर के गंडकों का भी कोई भरोसा नहीं है. साले भूँकने लगें तो चुप ही नहीं
होंगे.” कानजी सारे पेंच कस रहा है कि किसी तरह मसान आ जाये, जो अंत में आ ही गया.
मसान की दीवार आते आते दोनों ने दौड़ना एकदम बंद कर दिया, अब उनकी चाल और साँस की
धोंकनी दोनों सम पर है. “भाया, इत्ता बड़ा
और पक्का मसाण है, और बत्ती भी जल रही है इसमें तो... सहर में भूतों को भी बत्ती
की आदत होती है क्या.” बाबू ने इससे पहले कभी ऐसा सुन्दर और बड़ा मसाण नहीं देखा
था. बड़ा, पक्की बाड़, अन्दर कमरे, लाइटें, “ऐ भाया, चाल न अपन यहीं सो जाते हैं,
कोई न कोई तो राख गरम होगी. देख न रात भी
कित्ती हो गई है और ठण्ड भी, मेरे को धूजणी चढ़ रही है, चल न भाया.” बाबू को अभी शहर का कोई तौर-तरीका नहीं आता, वो
नींद, ठंड और थकन से गाफिल है. “अरे, बावला है क्या, कौन घुसने देगा तुझे भीतर, और
धीरे बोल, अभी चौकीदार ने सुन लिया तो डंडा फेंक के माथा फोड़ देगा. स्याणा-मूणा
इसी दीवार के पास बैठा रह, यहाँ चिता जलने की गरमास है अभी” कानजी ने उसके मुँह पर
हथेली अड़ाते हुए बरजा. उसका मन दुःख और लाचारी से कट रहा है, क्या करे वो, कैसे ये
रात गुजारे? उसे तो आदत पड़ गई, पडनी ही थी, आज सात साल होने आये बाप के मरने के
बाद से इसी हत्यारे शहर में रह के सायकिल रिक्शा चलाते हुए. दिन भर कड़ी मेहनत करके
अधपेट खाना और हाते के कोने में दुबक के रिक्शा में ही सो जाना उसको सह गया है अब.
लेकिन बाबू को ये सब सहते ही सहेगा. गाँव में आधी खाता था चाहे सूखी पाता था,
लोगों के घर हाली-चाकरी भी कर देता था पर दिन में स्कूल जाता था और रात को झूंपे
की गरमास में सोता था, माँ गुदड़ी पर सुला कर रजाई भी ओढाती था.
लेकिन कानजी क्या करे, उसके पास घर ही नहीं है, न
पैसा. गाँव भेज के और खुद के खर्चे से बचा-बचा के जो पैसा जोड़ा था कुछ माँ की
बीमारी में लग गया और कुछ आखिरी चाल-चलावे में. भाई को लेके यहाँ आया तो मालुम हुआ
हाते में खड़े रिक्शे के नीचे बंधी उसकी इकलोती रजाई भी उसी के जैसा कोई मुसीबत का
मारा चुरा ले गया. “अब आज की रात तो ऐसे ही काटनी पड़ेगी लाला, कल तो मैं रजाई का
इंतजाम कर दूंगा, बस आज की रात काट ले बीरा.” कानजी के लिए दस साल छोटा बाबू छोटा
भाई नहीं बेटा है. कल जैसे भी हो वो एक रजाई खरीद लायेगा चाहे उसे सारा दिन गधे की
तरह जुतना पड़े. “और हम सोयेंगे कहाँ?” बाबू की नादानी जाते ही जाएगी. “तेरे लिए
राजा जी का महल खुलवा दूंगा, रेशम की छपर खाट में मखमल के गद्दे पर पोढ जाना कुंवर
सा.” कानजी अनचाहे ही झुंझला गया, वो कैसे समझाये बाबू को कि इस शहर में एक कोठडी
लेने के लिए भी गाँठ में दो हजार रुपये चाहिए और उसके पास तो अभी पचास रूपये भी पूरे
नहीं होंगे
“कोई बात नहीं भाया, मैं भी तो हांसी ही कर रहा
था, चल हम दोनों फिर से रेस लगाते हैं.” बाबू बालक है, नादान है पर मूरख नहीं. रेस
लगाने का खेल खेल-खेल कर इस पोष की मौत सी ठंडी रात को काटने का खेल बाबू को थका
रहा है पर इस रात में हत्यारी ठंड से पार पाने का और उपाय भी तो नहीं है भाया के
पास. “नहीं रे, बहुत दौड़ लिए. अब बैठा रह थोड़ी देर यहीं. फिर चलते हैं हाते की
तरफ, सुबह पांच बजे वाली राजधानी के लिए स्टेशन जा लगूंगा, कोई तो सवारी मिलेगी
ही. और किसी के पास जगह दिखी तो तुझे भी कहीं न कहीं किसी के गुदडे में दुबकाने की
कोशिश करता हूँ, कोई न कोई तो मेरी तरह जल्दी जाने की हिम्मत करेगा ही. अरे हाँ
याद आया, राधे सैन को अपनी बीमार लुगाई का इलाज कराने के लिए रुपये चाहिए, वो जरूर
उठेगा सुबह, तू उसी की खाली गुदड़ी में सो जइयो.” कानजी को ये बात क्या याद आई उसकी
आधी चिंता कट गई. ‘आधी रात ही काटनी है अब तो ,फिर बाबू को सोने के लिए रजाई मिल
जाएगी और दिन उगने के बाद तो कोई चिंता ही नहीं, खूब जोर है घुटनों में अभी, ऐसी
दौड़ाऊँगा कि रिक्शा ही थक जाएगी. साँझ तक तो रजाई-चद्दर का इंतजाम कर ही लूँगा
मैं. और ढाबे वाले साईं से मांग के देखता हूँ, उधार देने को राजी हो गया तो पुराने
कपड़ों के ठेले से दो स्वेटर भी ले ही लूँगा. हरामखोर सेंकड़े पर दस रूपये ही तो
काटेगा, काट ले, इस धूजनी से तो छुटकारा मिलेगा.’ कानजी मन ही मन एक-एक चीज का
जुगाड़ लगा रहा है.
रात के करीब एक बजने को होंगे, ठंडी हवाओं में
घुली बरफ दोनों भाइयों की पीठ पर कोड़े बरसा रही है, धुल-धुल के झिरझिरे हो गये फटे
कमीजों की क्या औकात कि वो इस राक्षसी ठंड से जीत ले. दोनों भाइयों की साँस सम पर
आते ही उनके दांत बजने लगे है. “ले उठ बाबू चलते हैं, बात करते-करते रात काट
जाएगी, और तू शहर को देख समझ भी ले .आते साल तुझे सरकारी स्कुल में डाल दूंगा.”
बाबू पढाई में तेज है और कानजी के सपने की सीढ़ी. वो सपना जो बचपन से ही उसके मन
में बसा है. पढ़-लिख के रेलवे का अफसर बने, जब मन करे तब रेल में सेर करे. वो नहीं
तो बाबू बन जाये एक ही बात है. “ऐ बाब्या, तू कौन से दर्जे में था रे अब के बरस, नोवें
में न?“ कानजी ने उठते हुए बात चलाई. “हाँ भाया, अबके भी
पहले नम्बर पर पास हुआ था मैं.” बाबू पढाई के नाम से ही उछाह में भर जाता है.
“भाया, तू आते बरस मुझे फिर से पढने तो बिठा देगा न? भाया मैं पढ़-लिख के रेलवे का
अफसर बन जाऊं तो तू ये रिक्शा मत चलाना.” बाबू भाई का सपना अपनी आँखों में वहन कर
रहा है, बरसों से. “ना रे, फिर कतई ना चलाऊंगा मैं रिक्शा-पिक्शा, क्यों चलाऊं मैं
ये सब, मैं तो तेरी टरेन का गार्ड बन जाऊँगा. लाल-हरी झंडी दिखा के तेरी टरेन को
चलाऊंगा ना?” ट्रेन की बात आते ही दोनों भाइयों के खून में
गरमी सरसरा गई. पर ठंड को ये कहाँ मंजूर था, तीर की तरह सरदार पटेल स्क्वेयर के
पेड़ों से उतर कर सीधी उनके कलेजे में समा गई. बाबू के दांत बुरी तरह किटकिटा रहे
हैं, उसकी धूजनी बढती ही जा रही है, “भाया, बहुत जाड़ा लग रहा है.” वो फिर से
रुआंसा होने लगा. बस चार-सवा चार तक का
टेम पास कर ले बेटा, आज-आज की बात है.” कानजी का कालजा ठंड से कम और बाबू के दुःख
से ज्यादा कट रहा है. “चल, जरा जल्दी-जल्दी चल, डील में गरमाई आएगी. अरे जवान
मोटियार है ऐसी गंजी बातों से क्या घबराता है.” राम जाने उसने भाई को होंसला दिया
या खुद को.
चलते-चलते दोनों भाई वैशाली एन्क्लेव तक निकल
आये, अब बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच हवा के थपेड़े कुछ कम लग रहे हैं. “ओ रे राम जी,
इत्ते बड़े-बड़े घर, इनमे तो सेकड़ों कोठरियां होंगी रे भाया. कित्ते लोगों का कुनबा
है जो ऐसे घर बनाये हैं सेठों ने?” बाबू ने जीवन में पहली दफा अपार्टमेंट देखा है.
“ऊपरले कोठों में चढ़ते होंगे तो कैसे थक जाते होंगे न?” “इसमें एक घर नहीं, निरे
सारे लोगों के घर है लाला, इस एक घर में पचासों घर है. सब का न्यारा-न्यारा घर,
न्यारी-न्यारी दुनिया है. सातों जात, सातों भांत के लोग रहते हैं इनमें. और सबसे
ऊपरली मंजिल पे कोई पगों से नहीं जाता, सब बिजली के झूले से मिनटों में चढ़ जाते
हैं. तुझे भीतर से दिखा के लाऊंगा किसी दिन.” “हाँ भाया, पढ़ा था मैंने. लिफ्ट कहते
हैं उस बिजली के झूले को, है ना भाया.” बाबू उत्साह में है और सर्दी को भूल गया
है, ये देख कर कानजी को तात्कालिक राहत मिली . “हाँ रे, शहर में और भी कई चीजे
देखने की है, धीरे-धीरे सब दिखाऊंगा तुझे. सिनीमा भी दिखा के लाऊंगा एक दिन.”
“जागतेएएएए रहोओओओ” खडखडिया सायकिल की आवाज़ के
साथ चोकीदार की पास आ रही आवाज़ से कानजी कांप गया, “जल्दी से निकल ले बाबू,
चौकीदार ने देख लिया तो पुलिस को फोन कर देगा.” कानजी डरा हुआ फुसफुसाया. “ क्यों,
क्यों दे देगा पुलिस को, हम अपने रस्ते ही तो जा रहे हैं किसी के घर में घुस के
चोरी-अन्याय थोड़ी कर रहे हैं.” बाबू आवेश में फुसफुसाया जरुर पर भाई का कहना मान
के तुरंत सोसाइटी के बाहर निकल गया.
“ अच्छा भाया, चल अपन घर ...मतलब तेरे हाते में
चलें, तू मुझे रिक्शा चलाना सिखाइयो, हमारी रात पास हो जाएगी और ठंड भी नहीं
लगेगी.“ बाबू के भोलेपन पर कानजी को हंसी आ गई “तेरे-मेरे बाप का राज नहीं है
बेट्टा यहाँ, ये शहर है, चोर-डकैत को तो पकड़ते नहीं पर हमारे जैसे गरीब-गुरबों को
देख लेगा तो पुलिस वाला ठुल्ला पकड के चार डंडे धरेगा और गांठ में जो दस-बीस रुपये
हैं वो भी छीन ले जायेगा. पर चल चलना तो है ही, चल उधर ही चलते हैं.”
बाबू ने दोनों हाथ कस के बगल में दाब रखे हैं और दांतों को कस के भींचे है, पर बत्तीसी फिर भी किटकिट कर रही है. “बाबू, याद है माँ क्या कहा करती थी, पोस...खालड़ी कोस. सच्ची यार ये पोस तो खाल क्या हाड-पिंजर भी कोस ले जायेगा. हम गरीबों की तो सोच री सर्दी माता, “ कानजी लगातार बोले जा रहा है पर बाबू की बोलती बंद हो गई, वो सीत के साथ उनींदा, रुआंसा और थकान से बेहाल है. फूटे अंगूठे में भी दर्द की चीसें उठ रही है, उसे भूख भी लग गई है.
बाबू ने दोनों हाथ कस के बगल में दाब रखे हैं और दांतों को कस के भींचे है, पर बत्तीसी फिर भी किटकिट कर रही है. “बाबू, याद है माँ क्या कहा करती थी, पोस...खालड़ी कोस. सच्ची यार ये पोस तो खाल क्या हाड-पिंजर भी कोस ले जायेगा. हम गरीबों की तो सोच री सर्दी माता, “ कानजी लगातार बोले जा रहा है पर बाबू की बोलती बंद हो गई, वो सीत के साथ उनींदा, रुआंसा और थकान से बेहाल है. फूटे अंगूठे में भी दर्द की चीसें उठ रही है, उसे भूख भी लग गई है.
“अच्छा बाबू, तू क्या क्या पढता है स्कूल में,
मुझे भी बता यार, मैं तो अंगूठा छाप ही रह गया इस जूण में.” कानजी की आवाज़ में पानी
घुल गया तो बाबू सचेत हुआ “सच्ची कहूँ भाया, स्कूल में राख-धूल भी नहीं पढ़ाते, और आठ
क्लासों को बिचारे तीन मास्टर पढ़ायें भी कैसे, मैं तो खुद ही किताब लेके घोटता
रहता हूँ, गणित, अंग्रेजी नहीं समझ आते तो कभी शंकर गुरु जी से समझ लेता हूँ कभी
राम जी के छोरे से. पर अब तो जैसी थी वो भी छूट गई..” अंतिम वाक्य बाबू ने मन में
बोला.
अब दोनों भाई संजय
मार्किट की ओर निकल आये हैं, आलीशान दुकानों के पट बंद हैं पर साइन बोर्ड के ऊपर
चमकती रोशनियों से बाबू को सब दिख रहा है और बहुत कुछ वह समझ भी रहा है. कपड़ों की,
मिठाई की, खिलोनों की, जेवरों की दुकानें और इन सब के बीच ये गरम कपड़ों की दुकान..
कित्ते अच्छे-अच्छे कोट-स्वेटर बने हैं बोर्ड पर. बाबू का मन किया लोहे के पट पार
कर के अन्दर चला जाये. पर सयाना बाबू जल्दी-जल्दी आगे बढ़ता चला जा रहा है, भाई देख
लेगा तो खामाखां जी दुखायेगा, पर भाई ने फिर भी देख लिया “बस इस सियाले रुक जा
लाला, आते सियाले तुझे इसी दुकान से कोट-जर्सी पहना के ले जाऊँगा.” कानजी का बस
चले तो वो अपने भाई पे दुनिया लुटा दे, पर अभी उसके पास दुनिया का एक कोना भी नहीं
भाई के लिए. “ले बीरे, जरा जल्दी पग उठा, धीरे चलने से ठंड भर रही है डील में.” सच
में ठंड बहुत बढ़ गई है,
अब दोनों भाई बड़ी सडक से निकल कर दूसरी सडक पर आ गए
हैं जहाँ एक ओर के फुटपाथ पर बहुत से लोग रजाइयों में दुबके गहरी नींद सो रहे हैं.
‘रजाई.. कितने सुखी हैं ये लोग.’ बाबू को बस रजाई और रजाइयां ही दिख रहीं हैं पर
उसने मन फेर के आँखें भी फेर ली. ऑंखें फिराते ही दूसरी तरफ तना तम्बू उस की आँखों
में अटक गया. “भाया, चल ना, उस रेन बसेरे में रात काट लेते हैं.” बाबू जहीन तो है
ही, कुछ उसने पढ़ा और बाकी समझ लिया. “बावला हो गया है क्या छोरे, खबरदार जो कभी
फिर इस में सोने की सोची भी तो.” कानजी गुस्से और वितृष्णा से कसैला हो गया. बाबू
को बस ये समझ आया कि भाई को ये बात बुरी लगी है सो वो जल्दी से उस जगह से आगे निकल
गया पर तम्बू और रजाई की गरमास अभी भी उसकी कल्पना को सेक रही है.
अब दोनों भाई चुप है, बस चले जा रहे हैं,
लक्ष्यहीन, दिशाहीन. बस चल रहे हैं क्योंकि और ठंड के विरूद्ध कोई दूसरी चाल उनके
पास नहीं है. कानजी माँ की बीमारी, चालचलावे और दुःख-पीड़ा के ये पांच दिन में दम
भर भी आराम कर सका न आँख भर सो सका था, आज वो नींद पोष की बर्फानी ठंड को पीछे
ठेलती उस पर हावी होने लगी है लेकिन आँखों की जलती मिर्ची को जबरन जगाये वो चलता
जा रहा है. अब वो लोग आदर्श नगर फ्लाई ओवर के नीचे पहुँच गये हैं, उनका हाता बस
फर्लांग भर के अंतर पर है. हाता.. ‘जिसमे पचासों रिक्शे एक से एक सटे खड़े होंगे और
जिनके मालिक या किरायेदार भी वहीं ठसे सो रहे होंगे. दो-एक भिखारी और एक कोने में
बंधी हाते के मालिक की गायें, दो-चार आवारा कुत्ते भी वहाँ दुबके पड़े होंगे. गरीब
आदमी को किसी गरीब से द्वेष नहीं होता, चाहे वह मिनख हो या ढोर-डंगर. धरती माता की
कोख के जाये को धरती माता पे कौन बोझ. वहाँ उनके सोने के लिए भी जगह निकल ही जाएगी
ये बात पक्की है, पर बिना ओढने-बिछोने के नींद कैसे आएगी.’ कानजी के मन में जो चल रहा है बाबू उस से कतई अनजान है,
वो तो इस सब उधेड़बुन से परे बस एक रजाई चाहता है जिसे ओढ़ते ही वो सो सके, कहीं भी.
और इस कहीं भी की खोज वो अपने आसपास ही करता चल रहा है. “भाया, ये कोठडियाँ यहाँ
ऐसे खाली क्यों पड़ी हैं?” फ्लाई ओवर के नीचे बहुत से सरकारी कियोस्क खाली पड़े हैं
जिनमें कई के पल्ले ऐसे ही झूल रहे हैं. “रामजी जाने” कानजी बात टाल के आगे बढ़
गया. लेकिन बाबू के थमके कदम थमे ही रहे.
“चल छोरे, यहीं खड़ा रहेगा क्या? वो हमारा बाप पुलिस
का इधर आ मरा तो हमे मार देगा.” बाबू को नहीं पर कानजी को गश्ती पुलिस का खौफ है
कि वो कई सालों से ये भुगत रहा है.
“ए भाया..सुन ना, हम थोड़ी देर इस कोठडी में सो
जाएँ.” बाबू एक खाली पड़े कियोस्क के आगे खड़ा है जिसके पल्ले हैं पर खुले हुए. “देख
इस के किवाड़ भीतर से जुड़ लेंगे तो सीली हवा भी नहीं लगेगी और कोई देखेगा भी नहीं.
सुबह जल्दी उठ के निकल लेंगे, पुलिस साब को मालुम ही नहीं पड़ने देंगे हम.” सयानेपन से फुसफुसा के बोलते बाबू के जरूरतमन्द
दिमाग ने फुर्ती से सब सोच लिया, ‘बस किसी तरह से भाई मान जाए तो इस चलने और धूजनी
दोनों से निजात मिले. ना सही रजाई, कम से कम ये किवाड़ी हवा के फँचाटे तो रोकेगी.
और कुछ देर कमर सीधी हो जाए तो भाई को भी आराम मिले, उसे तो दिन उगने के साथ ही
बेगारी में लग जाना पड़ेगा.’ कानजी सुनते ही एक बार तो सनाका खा गया ‘छोरे का दिमाग
बहुत तेज है, इसे हाते के कल्लू गेंग से दूर रखना पड़ेगा.’ लेकिन ठण्ड के थपेड़े और
आन्खों की धुआँती मिर्चों ने उसके सोच को भी बाबू की राह पर पर छोड़ दिया ‘लड़का सच
कह रहा है, कम से कम इस बर्फानी ठंड में और भटकने से तो बचेंगे. बाबू की हालत देखी
नहीं जा रही अब. बिचारा, इस टाबर की उमर ही क्या है अभी, इस उमर में कित्ते दुःख
देखने पड़ रहे हैं करमहीन को. माँ-बाप मर गये और भाई है जो गैल-गैल रुलाता फिर रहा
है. इसका कहना मान ही लेता हूँ. एक रात ये भी सही, कल से तो मैं इंतजाम कर ही लूँगा...लेकिन
मुझे तो तड़के ही उठ के राजधानी के पेसेंजर के लिए टेसन जाना है, इसका क्या
करूंगा....चल कोई बात नहीं, मैं आते हुए चुपके से इसे जगा ले जाऊँगा. ये गुमटियाँ
तो वैसे भी खाली ही पड़ी है, एक बरस से तो मैं देख रहा हूँ.’
“चल फुर्ती से चढ़ जा...अरे..अरे धीरे चल, पगरखी
मत बजा और धीरे से चढ़, किवाड़ी की आहट मत करियो, जल्दी कर, किसी ने देख-सुणली तो
मारे जायेंगे.” जरुरत कभी-कभी दिमाग को इतना चतुर और फुर्तीला बना देती है कि उसकी
सोच और कारगुजारी एक साथ घटती है. कानजी और बाबू अब कियोस्क के भीतर हैं, गुमटी के
पट उन्होंने बंद भी कर लिए हैं और अपने धडकते कालजे को काबू में करने में लगे हैं.
वहाँ घुप्प अँधेरा न होता तो दोनों भाई फतह की ख़ुशी और भय की उत्तेजना से चमकते
एक-दुसरे के चेहरे देख पाते. कानजी ने बाबू को टटोला, वो भी उस की तरह उकडू बैठा
है. “सुन, चप्पल सिरहाने लगा के आडा हो जा, इधर माथा कर.” कानजी हाथ के टहोके से
बाबू को निर्देश दे रहा है.
अब दोनों भाई लेट गये हैं, संकरी कियोस्क में
उनकी लम्बाई बमुश्किल अट रही है. लेकिन जो भी मिला है उन दोनों को, खासकर बाबू को
सातवें सुख सा लग रहा है. कम से इस काल सी रात के दुखों का अंत तो आया. थके-हारे
कानजी और बाबू को ऊँघ के झोके भी आने लगे हैं पर कानजी को सुबह की सवारी लेने की
चिंता भी सता रही है, नींद नहीं खुली तो पचासों रूपये का नुकसान हो जायेगा, गरीबी
में आटा गीला. लेकिन ये नींद तो पीछा ही नहीं छोड़ रही ‘माई ठीक ही कहती थी, ये
नींद मरी रांड दूसरी मौत होती है मिनख की..’ कानजी किसी तरह खुद को जगाये रखना चाह
रहा है. लेकिन उसे ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ा, नींद के जोर से देह और दिमाग के
ढीला पड़ते ही शरीर को ठंड ज्यादा सताने लगी है और ओढ़ने की जरूरत पहले से भी ज्यादा
लग रही है. दोनों भाइयों के दांत एक सुर में कटकटाने लगे है, बाबू ने तो
छाती-घुटने एकमेक कर लिए हैं पर इस से क्या होता, पोष की रात ऐसे ही कट जाये तो
बात ही क्या. दोनों अपनी कोशिश कर रहे हैं और जाड़ा अपनी. और इसी कोशिश में बाबू का
हाथ कानजी की छाती से अड़ गया. “ऐ भाया, तेरा डील तो गरम-गरम है रे” भोले बाबू के
अनसोचे उद्गार अनचाहे ही होठों पर आ गये. कानजी को भाई की बात पर लाड़ भी आया और
लाज भी, क्या जवाब दे वो इसका. “भाया में तेरे से चिपक के सो जाऊं?” बाबू को बस
सर्दी का उपाय चाहिए.
कानजी ने ये बात सुनी और बस...जैसे उसकी आत्मा
में बारह दिन पहले बिछड़ी उसकी माँ लौट आई. “हाँ आजा, तू तो मेरा बेटा है बाबू रे,
जीजी भी तो हमको ऐसे ही चिपका के सुलाती थी ना, आज मै तेरी और तू मेरी जीजी. आजा
लाला.” कानजी अब ठंड की जगह भावों की चपेट में है “ना भाया, मुझे लाज आती है.”
बाबू अब बड़े भाई से शर्मा गया.
“क्यों, शरम की क्या बात, तू तो मेरा बेटा है. और
याद कर तू छोटा था तो जीजी से चिपक के नहीं सोता था क्या? मैं तो दादा से भी चिपट
के सो जाता था. माँ-बाप से कैसी लाज, और हम भी तो भाई-भाई ही हैं. देह की गर्मी से
ये रात कट जाये बस.” छः फुटे बाबू को कानजी ने अपनी छाती से ऐसे चिपकाया हुआ है
जैसे होते टाबर को माँ अपने कालजे से चिपका लेती है. बाबू के तन-मन दोनों को गरमास
आ गई है, वो रजाई भी भूल गया है इस समय.
“भाया, वो अपने गाँव
का इन्साफ मोहम्मद है ना, उसके कालेज की हिंदी की किताब में एक कहानी पढ़ी थी
मैंने. वो भी अपने जैसे गाँव के गरीब मिनखों की कहानी थी और उसका नाम भी पूस की
रात ही था.” बाबू आधी नींद में माँ से बातें कर रहा है.
“क्या था, मुझे भी बता ना?” थकी-हारी माँ नींद के बोझ तले से बोल रही है.
“क्या था, मुझे भी बता ना?” थकी-हारी माँ नींद के बोझ तले से बोल रही है.
“उसमे भी पूस के जाड़े की रात में एक किसान और
उसका कुत्ता हमारी ही तरह एक दुसरे की देही की गरमास में चिपट के सो जाते हैं.”
“सही है बीरे, दुःख-दरद और गरीबी में अपने-पराये
और मिनख-जानवर का भेद नहीं रहता रे. ये सारे भेद तो पैसे ने ही करे हैं.” कानजी की
ऑंखें अब पूरी तरह झिप गई है. “चल सो जा अब कुछ देर, फिर मुझे उठना भी है.” “हाँ,
भाया.” अब बाबू भी ममता की गरमास में डूब चला है.
बाहर
कड़ाके की ठण्ड है पर उस पांच बाय छः की गुमटी में
प्रेम और वात्सल्य की एक आरामदेह कुनकुनी दुनिया रजाई गद्दे की तरह खुली
पड़ी है जिसे ओढ़े-बिछाए दो बदन आश्वस्ति की गहरी नींद में सोये पड़े हैं. उन्हें
मालूम ही नहीं हुआ कि कब राजधानी आके चली भी गई और कब सूरज निकल के जाड़े पर हावी
हो गया.
तीसरे दिन के समाचारपत्र की सुर्खियाँ है ‘शहर
में सर्दी का प्रचंड प्रकोप, पिछले सतरह वर्ष में सर्वाधिक ठंडी रही पिछली रात.’
और उसी के नीचे एक अन्य खबर भी है ‘आदर्श नगर फ्लाई ओवर के नीचे खाली पड़े एक
कियोस्क में एक समलैंगिक जोड़ा मृत पाया गया. दोनों लड़के आवारा और असामाजिक
गतिविधियों में लिप्त थे.’
Wednesday, August 15, 2012
Thursday, June 7, 2012
पिछले कई दिनों से राजस्थान साहित्य अकादमी की गृह पत्रिका 'मधुमती' के कहानी अंक को ले कर तूफ़ान बरपा हुआ है.
कारण? वही कारण जो शाश्वत कारण बनता है,कहानियों पर अश्लीलता का आरोप.यानि जो मधुमती शहद सी सात्विक मधुमती थी वो हाला का प्याला परोसती मादक मधुमती हो गई है.
बहुत हंगामा हो गया और खबरची बंधुओं की और से टिप्पणी की मांग होने पर हम ने भी पढना चाहा मालूम हुआ मांग इतनी बढ़ गई है कि बाजार से गायब है,गजब.
खैर बात करनी थी तो आवश्यक था कि पढ़ा जाए.किसी तरह जुटाई और मन मारकर पढ़ी.
यहाँ 'मनमार कर पढ़ी,' मैं किसी नैतिक आडम्बर के साधू भाव से नहीं लिख रही हूँ बल्कि एक प्रताड़ित पाठक की तरह लिख रही हूँ जिसे उन कहानियों को पढना पड़ा.
सच तो यही है कि उनमे से अधिकाँश कहानियाँ या तो स्तरहीन हैं या पूर्व प्रकाशित. श्लील-अश्लील के मुद्दे को हटा दें तो भी यह अंक पुरानी तर्ज़ पर कहें तो 'अकहानी अंक' सॉरी, 'बुरी कहानी अंक' है.
खैर मुझे जो बात कहनी है वो शायद बहुत से लोगों को पसंद ना आये.
लेकिन क्या साहित्य में किसी भी कृति को अश्लील कह के खारिज कर देने के पहले हमें एक बौद्धिक साहित्यक दृष्टी से नहीं सोचना चाहिए.
क्या हम किसी भी रचना का मानदंड निर्धारित करते समय लेखक की मंशा और कहानी की संवेदना की मंशा को समझने की जरूरत नहीं होती कि अपनी कथा संवेदना और चरित्रों के साथ न्याय करते हुए लेखक यदि कोइ विशेष भाषा या ब्योरे देता है तो वह सदैव गलत ही होगा.
यदि ऐसा है तो निरस्त कर देना चाहिए कालिदास को, जायसी के पद्मावत को और मंटो को भी.क्योंकि वो भी इसी घेरे में आती हैं.
लेकिन ये सब मैं मधुमती की कहानियों 'संशय',विस्मरणीय' और 'सलीब पर' के पक्ष में नहीं लिख रही हूँ,उक्त सारी कहानियां दृष्टीहीन अतार्किक रूप से रची हैं जिन्हें सच में अश्लील कहा जा सकता है.
लेकिन इस सारे हंगामे में मनीषा कुलश्रेष्ठ की कहानी (जो कि पूर्व प्रकाशित तो है ही) 'कालिंदी' भी लपेटे में आगई है.उस पर भी अश्लीलता का आरोप है.
मुझे लगता है यह एक संवेदनशील विषय पर लिखी सशक्त कहानी है.जो एक अकेली माँ के संघर्षशील और सही अर्थो में आधुनिक चरित्र को लेकर बुनी गई है.मुख्य पात्र जिस परिवेश से उठ के आये हैं वहाँ ये दृश्य और भाषा कथा को विश्वसनीय बना रही है.इस कहानी का दुर्भाग्य है कि ये इस अंक में आई.
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