Saturday, August 6, 2011

नमन.

कितनी सारी बातें करतें हैं हम सब मिल के अपने इस ठीये पे.समाज,साहिय संस्कृति,राजनीती,फिल्म-संगीत..​.आदि...आदि...आदि...अच्छी-बुरी नई-पुरानी सब.फिर एक बड़ी त्रासदी को क्यों भुला दिया हमने?
आज ही के रोज़ 'लिटिल बॉय' नामक एक बड़ा राक्षस हिरोशिमा और नागासाकी नहीं अपितु सारी मानवीयता पर कहर बन कर गिरा था.आइये एक बार सारी संवेदना एकत्र कर के उन को स्मरण करें एवं ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें.

Tuesday, August 2, 2011

साहित्य में प्रक्षेपण

"तुलसी नर का क्या,बड़ा समय बड़ा बलवान,
भीलन लूटी द्वारिका,वो ही अर्जुन वो ही बाण."
माँ के मुख से यह दोहा अनगणित बार सुनते हुए बड़े हुए.जब बड़े होके विद्यारथी के रूप में पढ़ा तो यह दोहे जी कही नज़र ही नहीं आये.अब जैसे-जैसे साहित्य में रमते गए तुलसी को भी पढते गए और इस दोहे के प्रति उत्कंठा बढती ही गयी.तुलसी साहित्य के सारे कक्ष,अज्जे-छज्जे,टान्ड-अटारी,मञ्जूषा-पिटारियां,आरी-बारी,ताख-दिवाले ही नहीं चौक-चोबारे,अलियां-गलियां तक छान मारी पर ये मोती कहीं नहीं दिखा.अब जब कि ये भी समझ आ गया है कि साहित्य में प्रक्षेपण क्या होता है.फिर भी मेरी उत्कंठा आज भी वहीं खड़ी है.कोई मनीषी मित्र बताएगा कि इस दोहे के साथ तुलसी बाबा कैसे जुड गए?

Friday, July 15, 2011

शुरू है मेरी कलम की यात्रा जहाँ हम मिलेंगे प्रभावशाली शख्स से ,जिनके ब्लॉग :

(http://www.drlakshmi.blogspot.com/)
को तो हम देख ही चुके है इसके अलावा अपनी कहानी संग्रह” एक हंसी की उम्र “को भी महका चुकी है ... तो आइये इस यात्रा के आरम्भ में मैं मिलाती हूँ ....डॉ .लक्ष्मी शर्मा ,जो जयपुर में कोलेज लेक्चरर होने के साथ ही ,लेखिका व् ब्लॉगर भी है |
बंगाल में एक पत्रकार ने लिखा कि यौनकर्मी के पुत्र ने क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन किया। आम पाठक की तरह आप भी खेल से इतर क्रिकेटर की माता के संबंध में सोचने लगे होंगे, लेकिन डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा ने इस विचार की जमकर भर्त्‍सना की। उन्‍होंने युवा क्रिकेटर की मानसिक अवस्‍था की पैरवी करते हुए कहा कि एक बालक आज अपने अतीत से लड़ते हुए वर्तमान में अपने वजूद को तलाश रहा है, और पत्रकार उसके घटिया अतीत को कुरेदने का प्रयास कर रहा है। पेशे से शिक्षिका डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा जो खुद को मानववादी मानती हैं साथ ही नारीवादी दृष्टिकोण को एक बार फिर समझे जाने की जरूरत बताती हैं। प्रवीणा जोशी ने डॉ. लक्ष्‍मी से ऑनलाइन बातचीत की। यहां देखिए उसका सम्‍पादित अंश...
प्रवीणा: नमस्कार लक्ष्मी जी
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: नमस्कार।
प्रवीणा: आप ब्‍लॉगिंग में नई हैं, मगर लिखने से आप का सम्बन्ध कब से है?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: मैं महाविद्यालय में पढती थी, तभी से शैक्षणिक आलेख लिखती रही हूं। मेरी पहली बार बाल कहानी राजस्थान पत्रिका में वर्ष 2002 में छपी। साहित्यिक पत्रिका कथन में मेरी कहानी छपी। जिसकी तारीफ़ भी लिखी गयी और बाद में अनुवाद भी हुआ।
प्रवीणा: आपका ब्लॉग आखर माया विविधता लिए हुए है। कहीं आपने राजनीति को तो कही लेखकों की लेखनी तक को आड़े हाथों लिया है। ऐसी संवेदनाओं का स्रोत कहां से मिलता है?आपकी कोई सतत प्रेरणा?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: जी, सबसे ज्यादा तो पढ़ना और खूब पढा़ना। दूसरे, इस जिंदगी और सच्चे चरित्रों को गहरे से देखना। किसी वाद-विशेष से न जुडना और खुद को हमेशा विद्यार्थी मानना। प्रेरणा स्त्रोत भी कोई एक नहीं। जीवन ने जहाँ-जहाँ सिखाया, जैसे जैसे तरीके से सिखाया, तो मैंने भी शिष्य भाव से ग्रहण किया।
प्रवीणा: और सिखाने के बारे में आपके खयालात हैं?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: वह भी आप सिखाने का भाव दूर रख के ही कर सकते है। दूसरी बात शिक्षार्थी की ग्रहण-क्षमता। तीसरी बात, आतंकित किए बिना सरलतम तरीका और अंतिम बात गुरु का उस विषय पर पूरा अधिकार हो।
प्रवीणा: ‘’कई बार ऐसा होता है कि किसी बहुत अच्छी वस्तु का प्रत्येक पक्ष इतना अच्छा होता है कि उसकी लहर में उसका एक-आध बढ़िया पक्ष उपेक्षित हो जाता है’’
ये वाक्य मैंने आप ही के एक लेख से लिए है ,,,तो अब आप मुझे बता सकती हैं कि लक्ष्मी शर्मा का कौनसा पक्ष अभी तक उपेक्षित है?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: मुझे नहीं लगता। हाँ, फिल्मों से सम्बंधित जानकारी भी मुझे काफी है, उस विषय पर लिखना चाहती हूं, किन्तु पढ़ने,पढा़ने, संपादक कार्य करने (मैं एक साहित्यक पत्रिका 'अक्सर'की संपादक भी हूं) और अन्य आलेख वगैरह लिखने में व्‍यस्‍त रहने के कारण इस विषय पर काम नहीं कर सकी हूं अब तक। और हां, अपने समाज की अखिल भारतीय सांस्‍कृतिक मंत्री भी हूं।
प्रवीणा: अब नया क्‍या पक रहा है?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: अभी मेरा एक कहानी संग्रह 'एक हँसी की उम्र' प्रकाशित हुआ है।
प्रवीणा: क्या कुछ खुलासा करना चाहेंगी?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: ये कहानी संग्रह है। इसकी सभी कहानियां साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं और सराही गई हैं। 'दलित विमर्श एक शोधपत्र', 'मोक्ष ' और' खते मुतवाजी'कहानियां विशेष चर्चित हुई हैं।
प्रवीणा: आपके लेखों में आध्यात्मिकता और नारीवाद का प्रभाव दिखाई देता है। कोई खास वजह ?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: नारी नहीं इसे मनुष्‍यवाद कह सकते हैं। सबको बराबर सम्मान मिले नर हो या नारी हो। और जो दमित हो उसे उठाया जाये। अगर आप इस तथ्य को मान के इस पर चलते है तो ओढ़े हुए आध्यात्म की आवश्यकता नहीं पड़ती। मनुष्य का जहाँ कल्याण भाव है आत्मा अधोगति हो गई और आ गया आध्यात्म। बस में तो इसी छोटे से नियम पर चलती हूं।
प्रवीणा: आपका आम दिन कैसे गुजरता है?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: सामान्य स्त्रीयों की तरह गृहस्थी संभालना, बच्चों के साथ खेलना, आप जैसी मित्रों से गप्पें लगाना, सब कुछ सामान्य, बस।
प्रवीणा: ‘’अमेरीका की दादागिरी तो कब से चल रही है, अब ब्रह्मपुत्र को अपनी और मोड़ के चीन ने भी भारत के विरूद्ध पर्यावरण युद्ध का एलान कर दिया कल से दादागिरी भी करेगा,कर लेने दो, जो करेगा सो भरेगा, पाल बाबा आप ये बताओ मेरी बहू के विरूद्ध मेरी दादागिरी कब चलेगी ?’’
आपकी लेख की इन लाइनों ने मेरी उत्‍सुकता बढ़ा दी है, क्या मेरी सास की तरह आप भी अपनी बहु पर दादा गिरी की हिमायती हैं?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: ये सब व्यंग था। इस ज़माने की गडबड और हमारे अन्धविश्वास पर। इनका क्या उत्तर दूँ।
प्रवीणा: क्या किसी सामाजिक कार्यों में समय दे पाती है लेखन के बीच ?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: अपने समाज में स्त्री शिक्षा के लिये संघर्ष करती हूं। बच्चे बड़े हो गए, पति सहयोगी हैं। दिन में सोती नहीं, टी.वी.कम देखती हूं।
प्रवीणा: कोई संदेश देना चाहेंगी आज की युवा पीढ़ी और महिला ब्‍लॉगर्स को?
डॉ. लक्ष्‍मी शर्मा: लक्ष्य पर दृष्टि रखें। खूब पढ़े, गलत के विरूद्ध निर्भय हो के आवाज़ उठाएं और जीवन को सिर्फ भौतिकतावादी दृष्टि से न देखे। महिलाएं भी अपने व्यक्तिव को समाज में सक्षम बनाएं। अपने और अपनी साथियों के लिये विशेषकर बच्चियों के लिये शिक्षा के अधिकारों की रक्षा करे। निर्भय होकर लिखें। विचार साझा करे और सबसे बड़ी बात नारीवादी दृष्टिकोण को सही अर्थों में समझें।
प्रवीणा:धन्यवाद लक्ष्मी जी , उम्मीद है आपसे इसी तरह सीखने को मिलता रहेगा।,
लक्ष्मी शर्मा :धन्यवाद प्रवीणा जी ,मुझे भी “मेरी कलम की यात्रा “में आकर बेहद खुशी हुई |
दोस्तों ये है लक्ष्मी शर्मा जिनसे हमने बातचीत की ,और इसी तरह हमारे कलम की यात्रा चलती रहेगी ,,,हर बार एक बेहतरीन शख्स से मिलवाने का वादा करते हुए ....अलविदा !

Saturday, July 9, 2011

सुनो कामायनी.
तुम ह्रदय प्रान्त की वासिनी,तुम सरस भाव की स्वामिनी.
ओ चिंता भाव विनाशिनी
तुम आशा,तुम श्रद्धा,तुम लज्जा, तुम उदात्त काम की वाहिनी,
तुम से रस ब्रहम छलकता था आनंद तुम्ही में रहता था,
तुम सत्य की आख्यायिका,शिव भाव की संवाहिका
तुम सुंदरता की प्रतिमूर्ति,मनु वंश की तुम मातृका
तुमसे डरते थे कलुष भाव,तेरे समक्ष नत अहं भाव.
तुम मुक्ति कैलास की परम गति,मनुज प्रेय की पूर्ण सुगति
.तुम काव्य पुरुष अर्धांगिनी,रस-आतुर मन मधुमलिनी,
किन्तु सुनो कामायनी,
अब वह जय का समय नहीं, शांकर कल्याण का मूल्य नहीं,
अब नहीं प्रसाद गुण ग्राहक मन,
अब नहीं सुमन,अब नहीं सुमन,
अब समय नहीं तेरे मन का,अब काल नहीं उन स्वपनो का,
हैं ध्वस्त दुर्ग आदर्शों के, ढह गई समस्त प्राचीरें सब
अब इस यथार्थ के कटु युग में,संकुल,खंडित आदर्श हुआ,
अब सत्य विवश,शिवता बाधित, अब कलुषित वह सौंदर्य हुआ.
लो मांग विदा सब से सविनय,कर लो प्रयाण हे मानिनी,
लो मांग विदा कामायनी.
सुनो कामायनी.
तुम ह्रदय प्रान्त की वासिनी,तुम सरस भाव की स्वामिनी.
ओ चिंता भाव विनाशिनी
तुम आशा,तुम श्रद्धा,तुम लज्जा, तुम उदात्त काम की वाहिनी,
तुम से रस ब्रहम छलकता था आनंद तुम्ही में रहता था,
तुम सत्य की आख्यायिका,शिव भाव की संवाहिका
तुम सुंदरता की प्रतिमूर्ति,मनु वंश की तुम मातृका
तुमसे डरते थे कलुष भाव,तेरे समक्ष नत अहं भाव.
तुम मुक्ति कैलास की परम गति,मनुज प्रेय की पूर्ण सुगति
.तुम काव्य पुरुष अर्धांगिनी,रस-आतुर मन मधुमलिनी,
किन्तु सुनो कामायनी,
अब वह जय का समय नहीं, शांकर कल्याण का मूल्य नहीं,
अब नहीं प्रसाद गुण ग्राहक मन,
अब नहीं सुमन,अब नहीं सुमन,
अब समय नहीं तेरे मन का,अब काल नहीं उन स्वपनो का,
हैं ध्वस्त दुर्ग आदर्शों के, ढह गई समस्त प्राचीरें सब
अब इस यथार्थ के कटु युग में,संकुल,खंडित आदर्श हुआ,
अब सत्य विवश,शिवता बाधित, अब कलुषित वह सौंदर्य हुआ.
लो मांग विदा सब से सविनय,कर लो प्रयाण हे मानिनी,
लो मांग विदा कामायनी.
कर दो क्षमा कामायनी.

Monday, June 6, 2011

आप तो बह पधारो हुकुम.

मित्रो,आज एक कहानी.मैंने नहीं लिखी है,कहीं पढ़ी थी आज के हालात में बहुत याद आ रही है सो आपसे साझा कर रही हूँ.-

किसी समय,किसी गाँव में एक ठाकुर सा थे,खानदानी ठाकुर.रोबीला सरापा.तुर्रेदार पाग, बाँकडली मूंछें,अकड में अमचूर.उनके सामने 'ते' से 'रे' कहना तो बड़ी बात थी मजाल जो कोई आँख उठा के भी देख ले.तो एक दिन ठाकुर सा के मन में लहर उठी और वो घोड़े की सवारी पर विराजमान हो के भ्रमण के लिए निकल पड़े.संध्या का समय,नदी का किनारा,ठंडी बयार सब कुछ बड़ा सुहावना ठाठ..लेकिन अब घोड़े जी को नहीं जंचा तो नहीं जंचा,उन्होंने पैंतरा बदला और ठकुर सा उनकी पीठ से कूद कर नदी में जा बिराजे.अब नदी ज्यादा गहरी नहीं थी पर जिसको तैरना न आए उसके लिए तो नाला भी समंदर है सो ठाकुर सा भी बहने लगे.

तकदीर की बात उसी समय उधर से एक बंजारा दम्पति भी गुजर रहे थे बन्जारण की निगाह गोते खाते ठाकुर सा पर पड़ी और वो जान लगा के चिल्लाई-"अरे काल्या का दादा,भाग्यो जा,ठाकरियो डूब्यो."

अब ठाकुर सा को इतनी बदतमीजी सहन हो? वो डूबते उतरते गुस्से में दहाड़े--ऐ घीन्स्या,समझा ले तेरी लुगाई को.इसकी इतनी जुर्रत कि हमारे लिए ऐसे बात करे."

ठाकुर सा की बात सुनते ही नदी में कूदने को तत्पर बंजारा ठिठक कर जहाँ था वहीँ रुक गया और हाथ जोड़,गर्दन झुकाए दीनता से बोल-"खम्मा घनी सरकार.इस गवाँर में धेले भर की अक्कल होती तो मेरे साथ जंगल-जंगल ऐसे भटकती क्या.आप सा इस मूरख की बात पर ध्यान ही मत दो.आप तो बह पधारो हुकुम."

दोस्तो,कहानी खतम.मैंने सुना दी अब आप अटकल लगाइए कि इस कहानी में देश कौन है,जनता कौन,....कौन और ....कौन....?

जय हो.

Thursday, April 14, 2011

विष्णु या उसके अवतार राम और कृष्ण जैसे,सुन्दर,कुलशील,नागरी गुणों से युक्त,वैभवशाली,परम प्रतापी,चक्रवर्ती राजा के स्थान पर आज भी हर कन्या उस औघड,अवधूत ,श्न्सान वासी,फक्कड शिव की आराधना क्यों करती है.इस पर विचार किया है कभी.क्या है उसके पास?बर्फीले हिमालय की कंदराओं में ठिकाना.न ठीक से वस्त्र पहनते हैं न कोई दिशाओं में फैला साम्राज्य है.साथी भी है ती उन्ही की तरह उबड-खाबड.कभी किसी राक्षस को वर दे के पंगा ले लेते हैं तो कभी कामदेव को मार के सृष्टि परमपरा को ही खतरे में डाल देते है.कभी दक्ष के यग्य में जाके सारे प्रभु-वर्ग को ही ललकार उठते है.तीसरी आँख खुल गई तो गडबड और डांस शुरू कर दिया तो भी जान सांसत में. और भोले इतने कि कोई भी फायदा उठा ले. कोई अमर हो रहा है तो कोई खुद का पीछा छुड़ाने को उन्हें ज़हर पीने को उकसा रहा है .फिर भी वहीँ क्यों ...
इसलिए कि स्त्री के सम्मान और निजी अस्मिता की रक्षा का जो बोध शिव को है वो किसी अन्य को नहीं.उन्होंने न सती को राज-पात दिया न पारवती को.बस स्वयं को पूरी तरह समर्पित किया.
राम की तरह वे किसी प्रवाद के चलते अपनी पत्नि को त्यागते नहीं बल्कि उसका अपमान करने वाले के विध्वंस पर उतर आते हैं.जीवित पत्नि को त्यागना तो अलग वो उसके शव को भी बहुत पीड़ा के बॉस देह से उतरते हैं.
कन्हैया जी की तरह रास लीला रचा के मोहित करना उन्हें नहीं आता किन्तु उनकी एकनिष्ठता की पराकाष्ठा है कि उन्हें बेहद प्रेम करने वाली पारवती से भी वे बहुत परीक्षा के पश्चात विवाह करते है ककि प्रथम पत्नि के प्रेम में वे आकंठ डूबे थे.
सारे देवताओं में मात्र शिव ही हैं जो अपनी पत्नि को स्वतंत्र इकाई की तरह सम्मान देते है.पारवती गहनों में सज कर ऐश्वर्य उठाने की बंधनकारी सुविधाओं में न जीती हो किन्तु जब उनको मौज आये वो शेर पर सवार हो कर कहीं भी जा सकती है और किसी भी आततायी का नाश कर सकती है.यही नही ,ये शिव की आधुनिक चेतना ही है जो रौद्र रूपा पत्नि का क्रोधावेग शांत करने के लिये असकी लात अपने सीने पर खा लेते है. "सारी गृहस्थी तेरी जो तुझे रुचे वही कर" का भाव रखने वाले शिव स्त्री के गुणों से इतने अभिभूत है कि उसे अनुभव करने और आदर देने के लिये वो अर्द्धनारीश्वर को भी स्वयं जीते है.
यही कारण है कि हम सब शिव सा पति चाहतीं है कि हमारी निजता का आदर हो,हमें अपने स्वतंत्र बोध के साथ ससम्मान जीने का आनंद मिले.न सीता की तरह अग्निपरीक्षा दे के भी परितक्त्य होना पड़े, न रुक्मिणी की तरह सौतनों का दुख झेलना पड़े और न ही लक्ष्मी जी की तरह चरण दबाने पड़े.
तो क्यों मांगे कोई भी स्त्री राम,कृष्ण और विष्णु सा वर?

Tuesday, December 14, 2010

'पापा,जल्दी आ जाना','अनारकली भर के चली','दम है तो पास कर,वर्ना बरदास कर','पाछी आऊं सा','मेहनत मेरी ,रहमत तेरी','देता है रब,जलते हैं सब,..मालूम नहीं क्यों', 'नेकी कर,जूते खा','क्या देखता है गौर से ,आये हैं इंदौर से','लटक मत पटक दूँगी','सपने मत देख,सामने देख','क्या देख रहा है,अच्छा चल देख ले जल्दी से'.
सड़क-चलते वाहनों के पिछवाड़े(सॉरी,शालीन शब्दों में कहें तो पृष्ठ-भाग पर) लिखे कितने ही ऐसे वाक्य हैं जो हमें रोजमर्रा के जीवन में पढ़ने को मिल जाते हैं.कई बार कुछ अनोखे और अप्रचलित वाक्य भी पढ़ने को मिल जाते हैं जैसे पटनी टॉप की यात्रा के समय उधमपुर के पास खड़े एक ट्रक के पीछे पढ़ा-'अगर माँगने से सितारे मिल जाते तो आज आसमान खली नज़र आता'.इसी तरह एक सर्पिल से ट्रोलर के पीछे पढ़ा-'माफ़ करना,साइड जरा लम्बी चाहिए'तो ड्राइवर की विनम्रता पर आदर सा जाग उठा.इसी तरह एक बार खुद पर शर्म भी आई जब एक मलवाहक टैंक के पास से गुजरते हुए नाक-भौं सिकोड़ ही रही थी कि उसका पिछवाडा मेरे आभिजात्य को जीवन की सचाई भरा पाठ पढ़ा गया जहाँ लिखा था-'नसीब अपना-अपना.'
ज़िन्दगी का फलसफा,रास्तों की जोखिम,जिंदगी की अनिश्चितता,उसमें से गुजरते,रीतते-बीतते आम आदमी का जीवन,उसका स्वभाव और अनुभवों की असलियत जैसी तमाम बातें इन पृष्ठांकित वाक्यों में समाई होती है. रास्तों पे चलते हुए हम अनायास ही और कई बार सायास भी,इन्हें पढ़ कर इनका आनंद लेते हैं,पढ़ कर भूल जाते हैं,अक्सर मुस्कुरा देते हैं और कई बार उदास भी हो जाते हैं जब पढ़ते हैं-'पापा,जल्दी आ जाना,मम्मी याद करती है.'
इन वाक्यों में सर्वाधिक प्रचलित वाक्य है-'बुरी नज़र वाले.....' इस अधूरे वाक्य के पीछे के रिक्त स्थान को वाहन-मालिक अपनी-अपनी रूचि और नज़रिए के मुताबिक पूरा कर लेतें हैं.'तेरा मुँह काला'इस समस्या-पूर्ति में सबसे ज्यादा कम आने वाली पंक्ति है जो हमें हर तीसरे वाहन के पीछे धमकाती नज़र आ जाती है.लेकिन इस के अलावा और भी कई वाक्य हैं जो इस समस्या पूर्ति में सहायक सिद्ध होते हैं.'बुरी नज़र वाले,कडुआ ग्रास खा ले,''बुरी नज़र वाले तेरे बच्चे जियें,बड़े होके तेरा खून पियें'(लो जी,इसे कहते हैं दूरदृष्टि भरी दीर्घकालिक बददुआ.)कोई-कोई मदिरा प्रेमी खून की जगह दारु भी पिला देते हैं,कुछ भले उदारवादी मालिक'क्षमा वीरस्य भूषणं'की तर्ज़ पर 'बुरी नज़र वाले,तेरा भी भला'का उदघोष भी करते चलते हैं.इन पृष्ठ वाक्यों में प्रतिशोध,चिड,विरक्ति,औदात्य जैसी अनेक मानवीय प्रवृतियाँ हमारे सामने आ जाती है जो मानव-मन में स्थायी भाव के रूप में विद्यमान रहती है.
किन्तु पिछले दिनों एक वाहन के पीछे इसी वाक्य का तनिक अलग रूप पढ़ने को मिला जो मेरे लिए बिलकुल नवीन था.पढ़ते ही मन अभिभूत हो गया और वाहन-मालिक के उदात्त,उदार व्यक्तित्व के प्रति नतमस्तक हो गया.अद्भुत क्षमा-शांति औए'बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय'की भावना निहित है इन पंक्तियों में-'ना किसी की नज़र बुरी,ना किसी का मुँह काला,सबका भला करेगा उपर वाला.' मानव-मात्र की स्वस्ति-कामना,कितना विराट जीवन-दर्शन भरा है इस छोटी सी बात में कि ना कोई बुरा है ना इश्वर किसी का बुरा करेगा.किसी के लिए बुरा मत सोचो,दाता सबका भला करेगा,वाह.काश,हम सब,सारी सरकारें,विशेषकर सारे राजनेता ये बात मन के चलें तो क्या बात हो.
गर हम इन दिलचस्प वाक्यों के रंजन-मोद से बाहर आ कर तथास्त दृष्टि से सोचें तो समझ सकते हैं कि जितने बहुरंगी ये वाक्य हैं,उतनी ही इंसानी फितरत हैं.उनके भाव-अभाव,कुंठा-भय हैं.घर से दूर,अपनों से अलग,मौत के जबड़े में गर्दन डाले खतरनाक मोड़ों से गुज़रते वाहन-चालक की जिंदगी की अनिश्चितता,जरा पलक झपकी कि ना मौत के मुँह में समाते समय लगता है ना किसी का हत्यारा बन के सींखचों के पीछे जाते.सुनसान,ठिठुरती रात में टायर फट्ट,काली सूनी रात में डकैतों का डर,जून की दोपहर वाली चिडचिडी उमस में मीलों लम्बा ट्रेफिक जाम,धूल,पसीना उमस,सवारियों की किट-पिट,शोर.लगातार थकती देह को ना भावनात्मक ना ही दैहिक आराम मिले तो इस कुंठित-वंचित दशा में हर आवाज़ एक ही बात कहे ये हो ही नहीं सकता.जब ये बुरी नज़र वाले की अमंगल कामना करते हैं तब उसके पीछे भी यही असुरक्षा-बोध कम करता है आयर ललकारने चिढाने के पीछे भीयही कुंठित होकर उग्र स्वर में निकालता है.बस,कबीर की तरह कुछ हंस आत्माएँ हैं जो इस माया रुपी गंदले सरोवर में भी स्वच्छ कमल की तरह निर्लिप्त भाव से जीती रहतीं है,भीतर से स्नेहसिक्त किन्तु ऊपर से शुष्क.
तो अगली बार जब भी हम इन पृष्ठ वाक्यों को पढ़ें तो पढ़ कर भूल जाने या मुस्कुरा भर देने से आगे बढ़ कर जिन्दगी के फलसफे को समझें या चालक की मानसिकता पर सहानुभूतिपूर्वक गौर करें तो जीवन की एक छोटी सी लेकिन अलग फाँक के निराले स्वाद को चख पाएँगे.